उत्तर पूर्व की कविताएं - ८
Author
: siddheshwar singh
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 12-04-2013 02:30:00
'मुझे चाहिए
- ममांग दाई
(उत्तर पूर्व की कविताओं के क्रम में आज प्रस्तुत है अंग्रेजी में लिखने वाली अरुणाचली कवि ममांग दाई की एक और कविता। अनुवाद सिद्धेश्वर सिंह का है)
मेरे प्रियतम
मुझे चाहिए
प्रात:काल का महावर
मुझे चाहिए
ढलती दोपहर की स्वर्णिम सिकड़ी
मुझे चाहिए
चन्द्रमा की पायल
ताकि मैं नृत्य कर सकूँ
पुन: तुम्हारे संग।
मुझसे साझा करो
अपने हृदयंगम रहस्य
अपनी साँसें दो मुझे
फिर से।'
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उत्तर पूर्व की कविताएं - ७
Author
: siddheshwar singh
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 11-04-2013 02:30:00
'जन्म स्थान
- ममांग दाई
(ममांग दाई न केवल पूर्वोत्तर बल्कि समकालीन भारतीय अंग्रेजी लेखन की एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर है। वह पत्रकारिता ,आकाशवाणी और दूरदर्शन ईटानगर से जुड़ी रही हैं । उन्होंने कुछ समय तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी भी की , बाद में छोड़ दी । अब स्वतंत्र लेखन । उन्हें `अरूणाचल प्रदेश : द हिडेन लैण्ड´ पुस्तक पर पहला `वेरियर एलविन अवार्ड ` मिल चुका है साहित्य सेवा के'
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उत्तर पूर्व की कविताएं - ५
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 09-04-2013 04:50:00
'बिक्री के लिए
-पाल लिंगदोह
(खासी कवि पाल लिंगदोह का जन्म १९७२ में शिलोंग में हुआ था.
उनका एक द्विभाषिक काव्य-संग्रह प्रकाशित है. वे का खुन हाइनीत्रिप नेशनल अवेकनिंग
मूवमेंट के संस्थापक अध्यक्ष रहे. यह पार्टी खासी स्टूडेंट्स यूनियन के समर्थन से
बनी. अनुवाद गोपाल प्रधान का है.)
बिकाऊ है
यह गीली, रमणीय भूमि अपनी समस्त लाभकारी योग्यता के साथ
हमारे बेशकीमत खनिज औषधीय वृक्ष दुर्लभ'
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उत्तर पूर्व की कविताएं - ४
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 08-04-2013 02:30:00
'मूर्तिकार
- अनुपमा बसुमतारी
(असमिया कवयित्री अनुपमा बसुमतारी का जन्म १९६० में
ग्वालपाड़ा जिले के दारांगमिरि में हुआ था. उनके तीन काव्यसंग्रह प्रकाशित हो चुके
हैं. वे एल.आई.सी. गौहाटी में कार्यरत हैं. उन्हें भारतीय भाषा परिषद का ‘ईशान
सम्मान’ प्राप्त है. कविता का अनुवाद गोपाल प्रधान का है.)
मैंने पत्थर का परिधान पहना था
गहने भी पत्थर के
पत्थर के इन होंठों से
बोलना तो संभव ही'
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उत्तर पूर्व की कविताएँ – ३
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 07-04-2013 02:30:00
'फफूँद
-किनफम सिंग नोंकिनरिह
(खासी कवि किनफम सिंग नोंकिनरिह का जन्म १९६४ में सोहरा में
हुआ था. उनके दो काव्य संग्रह अंग्रेज़ी में और तीन खासी में छप चुके हैं. फिलहाल
वे नेहू, शिलांग में प्रकाशन विभाग में कार्यरत हैं)
घर के भीतर जहां रहता हूँ
बहुत ठंड और अँधेरा है.
इतनी ठंड कि कभी पता भी नहीं चलता
दिन कितना गरम है,
इतना अँधेरा कि कभी पता नहीं चलता
बाहर कितना बजा.
खिड़की'
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उत्तर पूर्व की कविताएँ – २
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 06-04-2013 02:30:00
'एक सपने की कहानी
-युमलेंबम इबोमचा
(अनुवाद – गोपाल प्रधान)
और कौन देख सकता है
ऐसा सपना?
मैंने एक सपना देखा, सुन्दर सपना
इसकी शुरुआत तकरीबन दुस्वप्न की तरह हुई.
हमारा घर था, घनघोर अँधेरा;
फर्श पर गाड़ी के कुचले गए चूहों की
मानिंद बच्चों की लाशें, अंतडियां बाहर निकलीं;
लम्बे लम्बे डग भरता मैं बाहर आया.
काफी कोशिश कर दरवाजा खोल मैं
बाहर निकला
सामने भी कोलतार की लंबी सड़क'
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उत्तर पूर्व की कविताएँ – १
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 05-04-2013 02:30:00
'उत्तर पूर्व की कविता पर वर्ष २००६ में ‘पहल’ पत्रिका के एक
पुस्तिका छापी थी. गोपाल प्रधान और सजल नाग के संपादन में तैयार इस पत्रिका के लिए
गोपाल प्रधान के हिन्दी अनुवाद किए थे. सजल नाग असम विश्वविद्यालय में इतिहास के
जानकार प्रोफ़ेसर रहे हैं और उत्तर पूर्व के इतिहास पर उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तकें
अंग्रेज़ी में प्रकाशित हैं.
पुस्तिका के अनुवादों के लिए डॉ. गोपाल प्रधान ने जो आलेख
लिखा'
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दुर्लभ थी वह मुस्कान ... हाँ पर थी वहीं
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 04-04-2013 02:30:00
'अमरीकी कवयित्री निक्की जियोवानी की प्रेम कविताओं की सीरीज़ में एक और-
तुम्हारे
बारे में कुछ फील्ड नोट्स
-निक्की जियोवानी
तीसरा
वाला कुछ लंबा है
मैं
थामती हूँ उसे
चौथा
छोटा है
मैं फांद जाती हूँ समूचे ढेर को
कोई
एक कराह सुनता है
वह
मैं होऊँगी
कोई
सुनता है एक उसांस
वह
होगे तुम
चीनी
की एक ढेरी
एक
नमक की
मैं
उनमें डुबोती हूँ अपनी उंगलियां
और
उन्हें चखती हूँ
लोग
बताते'
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अगर यह जादू यह अचरज यह उत्कंठा थम पाते तो
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 03-04-2013 02:30:00
'अगर
-निक्की जियोवानी
अगर
मैं कभी न हुई होती तुम्हारी बांहों में
न
नाचा होता वह नृत्य
न
सूंघी होती तनिक पसीने वाली तुम्हारी महक
हो
सकता था मैं सो पाती रातों को
अगर
मैंने कभी न थामा होता तुम्हारा हाथ
कभी
न गयी होती उतने नज़दीक
ब्रह्माण्ड
के सबसे चुम्बनीय होंठों के
अगर
कभी न की होती ख्वाहिश
तुम्हारे
गालों के गढे में अपनी जीभ को टिका देने की
हो
सकता था मैं सो पाती रातों को'
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आज एक रीपोस्ट - स्टारी स्टारी नाईट
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 02-04-2013 11:00:00
'आज एक बार दुबारा पेश कर रहा हूँ महान
कलाकार विंसेंट वान गॉग को प्यार करने वालों के लिए डॉन मैक्लीन का गाया गीत 'स्टारी नाईट'. जाहिर है यह गीत विंसेंट की मशहूर श्रृंखला 'स्टारी नाईट' से
प्रेरित है. लेकिन इस के बोल महान विंसेंट के संघर्ष भरे जीवन को रिकॉर्ड करते हुए
आधुनिक कला-संसार को लेकर कुछ बुनियादी सवाल भी उठाते हैं -
गीत के बोल हैं:
Starry, starry night.
Paint your'
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मैं दौड़ती हूँ तुम्हारे जीवन के साउंडट्रैक पर
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 02-04-2013 06:26:00
'७
जून १९४३ को नौक्स्विल, टेनेसी में जन्मी निक्की जियोवानी का वास्तविक नाम योलांडे
कौर्नेलिया जियोवानी था. उनकी परवरिश अलबत्ता सिनसिनाटी ओहायो में हुई. उन्होंने ऑल
ब्लैक फिस्क यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की जहां वे राइटर्स वर्कशॉप और स्टूडेंट्स नॉन वायलेंट
कोओरडीनेटिंग कमेटी से जुड गईं. साहित्य और राजनैतिक प्रतिबद्धता से उनका सम्बन्ध अगले
कई दशकों तक बना रहा.
१९६७
में वे अश्वेत कला आन्दोलन से'
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जीना इतना आसान मसला नहीं है भाई
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 01-04-2013 12:17:00
'ओरहान वेली की इस कविता को अनुवाद करते हुए मुझे उन्हीं के देश के महाकवि
नाजिम हिकमत की जीने के बारे में लिखीं कविताओं की श्रृंखला की बारहां याद आती
रही. नाजिम की कविताओं के शानदार अनुवाद हमारे वरिष्ठतम कबाड़ी वीरेन डंगाल ने किये
थे.
जीना
-ओरहान वेली
१.
मैं जानता हूँ आसान काम नहीं है जीना
या मोहब्बत करना और अपनी महबूबा के बारे में गीत गाना
रात को'
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परियों के रंग दमकते हों ख़ुम शीशे जाम छलकते हों
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 26-03-2013 11:52:00
'बाबा नज़ीर अकबराबादी की यह रचना पिछले कुछ सालों से होली के अवसर पर कबाड़खाने में लगती रही है. खास तौर पर मित्र आशुतोष बरनवाल के आग्रह पर. आज पुनः.
स्वर छाया गांगुली का है
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों
ख़ुम शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
जब फागुन रंग झमकते हों
नाच रंगीली परियों का
कुछ भीगी तानें होली की
कुछ तबले खड़कें रंग भरे
कुछ घुँघरू'
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होली खेलत नन्दकुमार
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 24-03-2013 07:30:00
'कल आपने पंडित
छन्नूलाल मिश्र से कम्पोजीशन “खेलें मसाने में होरी” सुनी थी. आज सुनिए उन्हीं के
अल्बम ‘होली के रंग टेसू के फूल’ से एक और रचना-'
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आज बिरज में होरी से रसिया
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 24-03-2013 02:30:00
'होली सुनिए शोभा
गुर्टू से -'
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होली की मची है धूम
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 23-03-2013 12:30:00
'जूथिका रॉय के
स्वर में एक दुर्लभ होली –'
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खेलें मसाने में होरी दिगंबर
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 23-03-2013 06:07:00
'होली
के स्वागत में पंडित छन्नूलाल मिश्र के स्वर में सुनिए यह कम्पोजीशन -'
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अन्ना कामीएन्स्का की नोटबुक से दो टुकड़े
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 22-03-2013 11:22:00
'१.
छितरी हुई ताकतों का मेरा सिद्धांत हर रोज और पक्का होता जाता है. जैसा कि
एंडरसन की परीकथा में होता है, ताक़त किसी आईने की तरह चूर चूर होती है और उसकी
किरचें तकरीबन हरेक दिल में जा घुंपती हैं. शिक्षक – शिष्य, चिकित्सक – रोगी,
सेल्स क्लर्क – ग्राहक: ये सारे सम्बन्ध ताक़त और निर्भरता की एक सतह पर आकार लेते
हैं. यह पूरे सिस्टम की एक बीमारी है. यहाँ तक कि बरामदे में सफाई कर रही औरत भी'
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भगवान का नाम उसने तभी लिया जब जूते ने काटा उसके पैर को
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 22-03-2013 02:30:00
'तीन समाधि-लेख
–ओरहान वेली
एक
उसे दुनिया में इतनी यातना किसी चीज़ से नहीं हुई
जितनी अपने मस्सों से;
खुद को इस कदर बदसूरत निर्मित किये गए होने को लेकर भी
उसने किसी के बारे में बुरा नहीं सोचा.
भगवान का नाम
उसने तभी लिया जब जूते ने काटा उसके पैर को,
उसे पापी भी नहीं माना जा सकता.
कितने अफ़सोस की बात है मरना पड़ा सुलैमान एफेंदी को.
दो
“टू बी ऑर नॉट टू बी”
नहीं था उसके'
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बस ऐसे ही
Author
: Ashok Pande
Blog
: कबाड़खाना
Date
: 21-03-2013 06:19:00
'बस ऐसे ही
-ओरहान वेली
सारी सुन्दर स्त्रियों ने सोचा
कि प्यार पर लिखी गईं मेरी सारी कविताएँ
उनके वास्ते थीं.
और मुझे बहुत खराब लगता रहा हमेशा
उन्हें बस ऐसे ही
लिख चुकने के बाद.'
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