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किरायेदार से बढ़ कर नहीं हम - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 21-05-2013 03:11:00

'अजब सा हाल देखा आसमाँ पर कई टूटे हुये दिल हैं वहाँ पर बदन की प्यास की ख़ातिर है पानी लिहाज़ा दर्द बरसे है जहाँ पर किरायेदार से बढ़ कर नहीं हम भले ही नाम लिक्खा है मकाँ पर बहारों में ख़िज़ाएँ नाचती हैं असर दिखता नहीं पर बागवाँ पर हमें जाना है बस पी की नगरिया नज़र रक्खे हुये हैं कारवाँ पर : नवीन सी. चतुर्वेदी बहरे हजज मुसद्दस महजूफ़ मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन 1222 1222'

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नीम सदैव जड़ों को ढूँढ व्यथा का मूल मिटाता है - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 20-05-2013 05:30:00

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क्या तसल्ली भरी नींद आई है - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 19-05-2013 02:35:00

'मुहतरम बानी मनचन्दा साहब की ज़मीन ‘आज फिर रोने को जी हो जैसे’ पर एक कोशिश।  आख़िरी वाले दो अशआर के सानी मिसरे बानी साहब के हैं सुख चमेली की लड़ी हो जैसे ग़म कोई सोनजुही हो जैसे हमने हर पीर समझनी थी यूँ गर्द, शबनम को मिली हो जैसे ज़िंदगी इस के सिवा है भी क्या धूप, सायों से दबी हो जैसे आस है या कि सफ़र की तालिब नाव, साहिल पे खड़ी हो जैसे  सफ़र की तालिब - यात्रा पर जाने की इच्छुक    सब का कहना'

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हम समझते रहे हयात गयी - अज़ीज़ बेलगामी

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 16-05-2013 19:00:00

'मुहतरम अज़ीज़ बेलगामी साहब की आमद से इस ब्लॉग के नूर में इज़ाफ़ा हुआ है। आप बड़े ही नेकदिल इंसान और हरदिल अज़ीज़ शायर हैं। आप के पढ़ने वाले हिंदुस्तान से ज़ियादा हिंदुस्तान के बाहर हैं। मालिक की मेहरबानी से आप को बड़ा ही सुरीला कण्ठ मिला है। इन की तमाम वीडियो रिकार्डिंग्स यू ट्यूब पर मौजूद हैं। आप की ग़ज़लें अक्सर हमें अपने साथ बहा ले जाती हैं।  मेरी बात की ताकीद आप की इस ग़ज़ल से भी होती है। ठाले-बैठे ब्लॉग'

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साँस जब घर बदल रही होगी - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 16-05-2013 01:25:00

'जॉन एलिया साहब की ज़मीन “जी ही जी में वो जल रही होगी” पर एक कोशिश जब हवा रुख़ बदल रही होगी अब्र की जान जल रही होगी अब्र - बादल ख़ुश्बुएँ ऐसी तो न थीं पहले हो न हो वो मचल रही होगी क्या तुम उस वक़्त मिलने आओगे साँस जब घर बदल रही होगी ये अँधेरे हैं बस निगाहों तक पेश्तर जोत जल रही होगी पेश्तर - [उसके] बाद / आगे सत्ह यूँ ही न थरथराई है ख़ाक पानी में रल रही होगी सत्ह - ज़मीन / धरती ख़ाक़ - मिट्टीरलना -'

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बात जब दिल बदन से करता है - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 14-05-2013 01:29:00

'नासिर काज़मी साहब की ग़ज़ल “कौन उस राह से गुजरता है” की ज़मीन पर एक कोशिश बात जब दिल बदन से करता है तब कहीं आदमी सँवरता है आब जब आग से गुजरता है इक नई शय का नक़्श उभरता है आब - पानी बात सुनता नहीं हवाओं की आब धरती पे ही उतरता है हर परिन्दे का धर्म है उड़ना कोई तो है जो पर कतरता है आदमी भूलता नहीं कुछ भी बा-ज़रूरत फ़क़त मुकरता है अपने कल की ही फ़िक्र है सब को कौन दुनिया में रब से डरता है एक'

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बशर की भी अपनी हदें हैं जनाब - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 13-05-2013 02:05:00

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भाँग चढ़ाये नाच रहे सब - प्रवीण पाण्डेय

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 08-05-2013 04:06:00

'आशा नहीं पिरोना आता, धैर्य नहीं तब खोना आता,नहीं कहीं कुछ पीड़ा होती, यदि घर जाकर सोना आता,  मन को कितना ही समझाया, प्रचलित हर सिद्धान्त बताया,सागर में डूबे उतराते, मूढ़ों का दृष्टान्त दिखाया, औरों का अपनापन देखा, अपनों का आश्वासन देखा,घर समाज के चक्कर नित ही, कोल्हू पिरते जीवन देखा, अधिकारों की होड़ मची थी, जी लेने की दौड़ लगी थी,भाँग चढ़ाये नाच रहे सब, ढोलक परदे फोड़ बजी थी, आँखें भूखी, धन का'

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आदम की औलाद ग़ज़ब करती है यार - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 05-05-2013 05:08:00

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एक तीर से कर लिये..हमने तीन शिकार - आदिक भारती

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 03-05-2013 20:30:00

'दो ही पल के दर्द में..हम हो गये निढाल तू कैसे हँसता रहा..दुख में सालों-साल जब विपदा की रैन में..छोड़ गये सब साथ मुझको सहलाते रहे..जाने किसके हाथ चादर से बाहर हुए..जब से अपने पाँव कंधों-कंधों धूप है..घुटनों-घुटनों छाँव कवि बनकर हासिल हुए..यश दौलत सत्कार एक तीर से कर लिये..हमने तीन शिकार युग बदले, बदले नहीं-निर्धन के हालात आज तलक भी ढाक के..वही तीन हैं पात मुख दमके आह्लाद'

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दो ग़ज़लें - वीनस केशरी

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 01-05-2013 23:30:00

'उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना । झूठ को लेकिन लगे है अब भी ख़ंजर आइना ।। शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है।पत्थरों के शह्र में घूमा था दिन भर आइना ।। ग़मज़दा हैं, ख़ौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ।कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना ।। मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया।रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना ।। तब्सिरा - आलोचना / समीक्षा  अपना अपना फ़ैसला है, अपना अपना'

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मेरे बच्चो ! इस धरती पर प्यार की गंगा बहती थी - आलम ख़ुर्शीद

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 30-04-2013 01:38:00

'जीवन तो है खेल तमाशा , चालाकी, नादानी है तब तक ज़िंदा रहते हैं हम जब तक इक हैरानी है आग हवा और मिटटी पानी मिल कर कैसे रहते हैंदेख के खुद को हैराँ हूँ मैं , जैसे ख़्वाब कहानी है इस मंज़र को आखिर क्यूँ मैं पहरों तकता रहता हूँ ऊपर ठहरी चट्टानें हैं , तह में बहता पानी है मेरे बच्चो ! इस धरती पर प्यार की गंगा बहती थीदेखो ! इस तस्वीर को देखो ! ये तस्वीर पुरानी है आलम ! मुझको बीमारी है नींद'

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पाँच हाइकु - कैलाश शर्मा

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 28-04-2013 14:16:00

'दुर्गा की पूजाकन्या की भ्रूण हत्यादोगलापन.रात का दर्द समझा है किसने देखी है ओस?न जाने कब फिसली थी उँगलीयादें ही बचींविकृत मनदेखे केवल देहबालिका में भी. नयन उठे, बेरुखी थी आँखों में, बरस गये   :- कैलाश शर्मा'

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हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 27-04-2013 02:59:00

'अगर थाली में सिर्फ़ हलवा रख दिया जाये या सिर्फ़ नमकीन, तो आप को कैसा लगेगा? मैं समझता हूँ यही बात साहित्य [चाहे वह ग़ज़ल ही क्यूँ न हो] पर भी लागू होती है। कुछ लोगों को लगता है कि ग़ज़ल सिर्फ़ विशेष विषयों पर ही केन्द्रित रहनी चाहिये। चचा दुष्यंत के समझाने पर भी नहीं समझे हैं ऐसे महानुभाव.... क्या करें? भाई जहाँ तक तकनीक का प्रश्न है वह तो ठीक, पर विषय तो हर शायर के अपनी पसंद के होते हैं। लिहाज़ा'

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चन्द अशआर - मयंक अवस्थी

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 21-04-2013 03:04:00

'तारों से और बात में कमतर नहीं हूँ मैं जुगनू हूँ इस लिये कि फ़लक पर नहीं हूँ मैं मियाँ मजबूरियों का रब्त अक्सर टूट जाता है वफ़ाएँ गर न हों बुनियाद में, घर – टूट जाता है इस तरह हमने समन्दर को पिलाया पानी अपनी कश्ती किसी साहिल पे न मोड़ी हमने तनहाइयों में ऊब रही है मशीनगन जाने कहाँ फ़रार हुये इन्क़लाब सब अब इक हक़ीर ही उस से शिनाख़्त माँगेगा गुज़र के आग से जो बारहा निखर आये बदन की प्यास वो शै है कि'

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भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी - तुलसीदास

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 19-04-2013 03:30:00

'राम जन्म भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी .  हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ..  लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी .  भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी ..  कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी किहिं बिधि करौं अनंता .  माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता ..  करुना सुख सागर सब गुन आगर जिहिं गावहिं श्रुति संता .  सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ'

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जिसे भी थोड़ी इज़्ज़त दे दी वो ही सर पर बैठ गया - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 19-04-2013 02:33:00

'आँसू टपका और फिर यूँ उस के पैकर पर बैठ गया जैसे इक पानी का क़तरा अस्ल गुहर पर बैठ गया पैकर - देह / आकृति गुहर - मोती   भोर हुई, चिड़ियाँ चहकीं, कलियों पर भँवरे बैठ गये दीवाना दिल क्या करता, यादों के खँडर पर बैठ गया उम्मीदों को मायूसी में ढलते देख रहा हूँ रोज़ हाय! दिलेनादाँ!! किस पत्थरदिल के दर पर बैठ गया दूर-दूर तक उल्लू क्या साया भी'

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जिसे भी थोड़ी इज़्ज़त दे दी वो ही सर पर बैठ गया - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 17-04-2013 01:59:00

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एक तमाशे के लिये और तमाशे कितने - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 17-04-2013 01:54:00

'ज़िन्दा रहने के लिये और बहाने कितनेएक तमाशे के लिये और तमाशे कितनेबाँह फैलाये वहाँ कब से खड़ा है महबूबरूह बदलेगी बदन और न जाने कितनेआग पानी से बचाओ तो हवा की दहशत ज़िन्दगी अक्स बनाये तो बनाये कितनेअपनी यादों में न पाओ तो नज़र से पूछोऔर होते भी हैं यारों के ठिकाने कितनेजैसे आये हैं यहाँ वैसे ही जाना होगा बात सच है ये मगर बात ये माने कितने:- नवीन सी. चतुर्वेदी फ़ाएलातुन फ़एलातुन फ़एलातुन फालुन'

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ख़मोशियों को इशारों से भी रहा परहेज़ - नवीन

Author : NAVIN C. CHATURVEDI      Blog : ठाले बैठे      Date : 14-04-2013 15:02:00

'मैं दिल की स्लेट पे जो ग़म तमाम लिख देताकोई न कोई वहीं इन्तक़ाम लिख देता इंतक़ाम - प्रतिशोध / बदला  ख़मोशियों को इशारों से भी रहा परहेज़ वगरना कैसे कोई शब को शाम लिख देता शब - रात मेरे मकान की सूरत बिगाड़ने वाले तू इस मकान पे अपना ही नाम लिख देतावहाँ पहुँच के भी उस की तलाश थी कुछ औरफ़क़ीर कैसे खँडर को मक़ाम लिख देता मक़ाम - मंज़िल  मेरे भी आगे कई पगड़ियाँ फिसल पड़तींजो अपने नाम के आगे इमाम लिख'

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