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जमाव रिश्तों का ...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 20-05-2013 14:26:00

'एक ज्योतिषी ने एक बार कहा थाउसे वह मिलेगा सबजो भी वह चाहेगी दिल सेउसने मांगापिता की सेहत,पति की तरक्की,बेटे की नौकरी,बेटी का ब्याह,एक अदद छत.अब उसी छत पर अकेली खड़ीसोचती है वोक्या मिला उसे ?ये पंडित भी कितना झूठ बोलते हैं. ************************ चाहते हैं हम कि बन जाएँ रिश्ते  जरा से प्रयास से  थोड़ी सी गर्मी से  और थोड़े से प्यार से  पर रिश्ते दही तो नहीं  जो जम जाए बस दूध में  ज़रा सा जामन मिलान(...)'

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त्रिशूल,चीड़ और भांग --दिग दिगंत आमोद भरा...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 09-05-2013 10:54:00

'  आह हा आज तो त्रिशूल दिख रही है. नंदा देवी और मैकतोली आदि की चोटियाँ तो अक्सर दिख जाया करती थीं हमारे घर की खिडकी से। परन्तु त्रिशूल की वो तीन नुकीली चोटियाँ तभी साफ़ दिखतीं थीं जब पड़ती थी उनपर तेज दिवाकर की किरणें. एकदम किसी तराशे हुए हीरे की तरह लगता था हिमालय। सात रंगों की रोशनियाँ जगमगाया करती थीं. एक अजीब सा सुकून और गर्व का सा एहसास होता था उसे देख. कि यह धीर गंभीर, शांत, श्वेत ,पवित्र सा गिरिराज हमारा है, कोई बेहद अपना सा.  यूँ वो चीड़ के ऊँचे ऊ(...)'

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चीखते प्रश्न...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 03-05-2013 15:53:00

'कैसे कहूँ मैं भारतीय हूँ  क्यों करूँ मैं गुमान  आखिर किस बात का  क्या जबाब दूं उन सवालों का  जो "इंडियन" शब्द निकलते ही  लग जाते हैं पीछे ... वहीँ न ,  जहाँ रात तो छोड़ो  दिन में भी महिलायें  नहीं निकल सकती घर से ? बसें , ट्रेन तक नहीं हैं सुरक्षित क्यों दूधमूंही बच्चियों को भी  नहीं बख्शते वहां के दरिन्दे ? क्या बेख़ौफ़ खेल भी नहीं सकतीं  नन्हीं बच्चियाँ ? कैसे जाते हैं बच्(...)'

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जंगल, फन और "मोहब्बतें"...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 29-04-2013 11:28:00

'मैंने अपनी पिछली गाँव वाली पोस्ट में जिक्र किया था कि वहां की योजना बनाते वक़्त बच्चों के थोबड़े  सूज गए थे,और हमें समझ में आ गया था कि जब तक इन बच्चों के लायक भी किसी स्थान का चयन नहीं किया जाएगा हमारी भी गाँव यात्रा खटाई में पड़ी रहेगी। अपनी आँखों और मन को विटामिन G देने के लिए जरूरी था की  उनके विटामिन M (मस्ती ) का इंतजाम किया जाता।  अभी इसी विषय पर जब दिमाग , मन और जेब की मंत्रणा चल रही थी इत्तेफाकन तभी टीवी पर फिल्म मोहब्बतें (यश &n(...)'

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थोड़ा अपना सा,थोड़ा बेगाना सा ..

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 19-04-2013 09:26:00

'इस शहर से मेरा नाता अजीब सा है। पराया है, पर अजनबी कभी नहीं लगा . तब भी नहीं जब पहली बार इससे परिचय हुआ। एक अलग सी शक्ति है शायद इस शहर में कि कुछ भी न होते हुए भी इसे हमने और हमें इसने पहले ही दिन से अपना लिया। अकेलापन है, पर उबाऊ नहीं है। सताती हैं अपनों की यादें, कचोटता है इतिहास, बेबस कर देती हैं दूरियां फिर भी ...जाने क्या है कि इससे जुड़ा हुआ ही महसूस करती हूँ . एक सुरक्षा कवच की तरह यह सहेजे रहता है मुझे। जब भी कभी जिन्दगी से निराशा सी हुई इसने ही संभाल(...)'

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बड़ा हुआ बच्चा.

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 15-04-2013 15:41:00

'एक मित्र को परिस्थितियों से लड़ते देख, उपजी कुछ पंक्तियाँ  पढ़ा था कहीं मैंने  किसी का लिखा हुआ कि  "शादी में मिलता है  गोद में एक बच्चा  एक बहुत बड़ा  बच्चा". अक्षम हो जाते हैं जब  उसे और पालने में  उसके माता पिता, तो सौंप देते हैं  एक पत्नी रुपी जीव को.  जिसे देख भाल कर ले आते हैं वे  किसी दूसरे के घर से . फिर वह पत्नी पालती है,  उस बड़े हो गए बच्चे को. झेल(...)'

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सुकून के वास्ते, ये गाँव के रास्ते...(कोट्स वोल्ड)

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 09-04-2013 16:05:00

'मेरे ख़याल से घुमक्कड़ी शौक या आदत नहीं बल्कि एक रोग है। एक ऐसा रोग जो लग गया तो लग गया फिर इससे छुटकारा नामुमकिन सा है। वक़्त के साथ इसकी गंभीरता कम बेशक हो जाये , या हो सकता है बाहर से यह रोग नजर न आये परन्तु अन्दर ही अन्दर सालता जरूर रहता है। अब इसे अपना सौभाग्य कहूँ या अपने - अपनों का दुर्भाग्य कि यह रोग मुझे बचपन से लगा हुआ है और इन तानो के वावजूद कि " घूमने का नाम लो तो यह चिता से भी उठ खड़ी हो "  इस रोग के निदान के लिए हर दूसरे - ती(...)'

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उगतीं हैं कवितायें...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 02-04-2013 10:42:00

'एक दिन  उसने कहा कि नहीं लिखी जाती अब कविता लिखी जाये भी तो कैसे कविता कोई लिखने की चीज़ नहींवो तो उपजती है खुद ही फिर बेशक उगे कुकुरमुत्तों सी,या फिर आर्किड की तरहहर हाल में मालकिन है वो अपनी ही मर्जी की।कहाँ वश चलता है किसी का, जो रोक ले उसे उपजने से। हाँ कुछ भूमि बनाकर उसे बोया जरूर जा सकता है। बढाया भी जा सकता है, कुछ दिमागी खाद पानी डाल कर .संवारा भी जा सकता है, कुछ कृत्रिम संसाधनों से।फिर वो कविता जैसी तो हो(...)'

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रंगों का मेला-देश काल से परे...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 25-03-2013 18:32:00

'होली आने वाली है। एक ऐसा त्योहार जो बचपन में मुझे बेहद पसंद था। पहाड़ों की साफ़ सुथरी, संगीत मंडली वाली होली और उसके पीछे की भावना से लगता था इससे अच्छा कोई त्योहार दुनिया में नहीं हो सकता।फिर जैसे जैसे बड़े होते गए उसके विकृत स्वरुप नजर आने लगे। होली के बहाने हुडदंग , और गुंडा गर्दी जोर पकड़ने लगी और खुशनुमा रंगों की जगह कीचड , तारकोल और कांच वाले रंगों ने ले ली और धीरे धीरे मेरे मन में होली का उल्लास कम होता गया। परन्तु फिर भी कोई भी परम्परा, त्योहार या रिवाज़ जो अपने द(...)'

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एक दिन "लेखनी सानिध्य" में ...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 19-03-2013 11:36:00

'मार्च ख़तम होने को है पर इस बार लन्दन का मौसम ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा। ठण्ड है कि कम होने को तैयार नहीं और ऐसे में मेरे जैसे जीव के लिए बहुत कष्टकारी स्थिति होती है। पैर घर में टिकने को राजी नहीं होते और मन ऐसे मौसम में बाहर निकलने से साफ़ इनकार कर देता है। ऐसी परिस्थितियों में अगर कहीं से निमंत्रण आ जाये तो मैं अपने मन को बहाना देकर ठेलने में कामयाब हो जाया करती हूँ। आखिर यही हुआ। बर्मिंघम में रहने वाली साहित्यकार, शैल अग्रवाल (लेखनी डॉट (...)'

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अब और क्या ??

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 13-03-2013 11:36:00

'भाव अर्पित,राग अर्पित  शब्दों का मिजाज अर्पित  छंद, मुक्त, सब गान अर्पित  और तुझे क्या मैं अर्पण करूं। नाम अर्पित, मान अर्पित  रिश्तों का अधिकार अर्पित  रूचि, खेल तमाम अर्पित  और तुझे क्या मैं अर्पण करूँ  शाम अर्पित,रात अर्पित  तारों की बारात अर्पित  अधूरे से ख्वाब अर्पित  और तुझे क्या मैं अर्पण करूँ। रूह अर्पित, जान अर्पित  जिस्म में&nb(...)'

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विचारों की मनमानी....

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 06-03-2013 13:34:00

'सुना है, लिखने वाले रोज नियम से २- ४ घंटे बैठते हैं। लिखना शुरू करते हैं तो लिखते ही चले जाते हैं। मैं आजतक नहीं समझ पाई कि उनके विचारों पर उनका इतना नियंत्रण कैसे रहता है। मैं तो यदि सोच कर बैठूं कि लिखना है तो दो पंक्तियाँ न लिखीं जाएँ . मेरे विचारों की आवाजाही तो जिन्दगी और मौत की तर्ज़ पर पूरी तरह ऊपर वाले पर निर्भर है। यूँ शायद सभी के होते हों पर उनके घरों में छत होती हो, और ऊपर जाकर वे उतार लाते हों ख्याल। पर यहाँ तो कमबख्त छत भी ऐसी नहीं होती की कोई चढ(...)'

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पन्नों में सिमटा रूस है “स्मृतियों में रूस”

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 04-03-2013 09:47:00

'"स्मृतियों में रूस" को प्रकाशित हुए साल हो गया. इस दौरान बहुत से पाठकों ने, दोस्तों ने, इस पर अपनी प्रतिक्रया से मुझे नवाजा. मेरा सौभाग्य है कि अब भी, जिसके हाथों में यह पुस्तक आती है वो मुझतक किसी न किसी रूप में अपनी प्रतिक्रिया अवश्य ही पहुंचा देते हैं.पिछले दिनों दिल्ली के स्वतंत्र पत्रकार शिवानंद द्विवेदी"सहर ने इस पुस्तक की विस्तृत समीक्षा की, जिसके कुछ अंश दैनिक जागरण ने प्रकाशित किये.वही  समीक्षा का सम्पूर्ण स्वरूप में आपकी नजर है. पन्नों में सिमटा रूस ह(...)'

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टप टप टपा टप टप ....

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 25-02-2013 14:18:00

'सुनो आज मौसम बहुत हसीं है  फिफ्टी फिफ्टी  के अनुपात में सूरज और बादल टहल रहे हैं चलो ना , हम भी टहल आयें जेकेट - नहीं होगी उसकी ज़रूरत हाँ ले चलेंगे अपनी वो नीली छतरी जिसपर  गिरती हैं जब बारिश की बूँदेंतो रंग आसमानी सा हो जाता है और टप टप की आवाज के साथ लगता है जैसे खुले आकाश के नीचे कर रहा हो कोई टैप डांस एक ही छतरी को दोनों पकड़ते हुए कितना मुश्किल होता है न चलना तुम हमेशा कहते हो बीच रास्ते (...)'

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गलियों के ये गैंग.

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 18-02-2013 10:49:00

'पिछले दिनों एक समाचार पत्र में छपी खबर के मुताबिक एक 16 साल के लड़के को 15 हूडी लड़कों ने चाकू से गोदकर बेरहमी से सरे आम सड़क  पर मार डाला . वह बच्चा छोड़ दो  , ऐसा मत करो की गुहार लगाता रहा और वे उसे चाकू से मारते रहे। यह इस साल का लन्दन में होने वाला पहला नाबालिक लड़के का खून है , जबकि पिछले साल 17 वर्षीय एक युवक को ऐसे ही चाकू से वार करके मृत अवस्था में सड़क पर छोड़ दिया गया था। रि(...)'

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अपने हिस्से का आकाश ...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 11-02-2013 13:04:00

'रात बहुत गहरी है  फलक पर सिमटे तारे हैं  एक बूढा सा चाँद भी  अपनी बची खुची चाँदनी, ओढ़े खडा है.  आस्माँ ने मुझे  दिया है न्योता, सितारों जड़ी एक चादर  बुनने का. इसके एवज में उसने  किया है वादा  शफक पर थोड़ी सी  जगह देने का.  पर मुझे तो पता है  शफ़क़ सिर्फ एक धोखा है  ये चाल है निगोड़े आस्माँ की  मुझे छलने जो चला है  स्वार्थी है बहुत व(...)'

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हलवा -परांठा से पापा...

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 05-02-2013 17:28:00

'इंसान अगर स्वभाववश कोमल ह्रदय हो तो वह आदतन ऊपर से एक कठोर कवच पहन लेता है। कि उसके नरम और विनर्म स्वभाव का कोई नाजायज फायदा न उठा सके। ज्यादातर आजकल की दुनिया में कुछ ऐसा ही देखा जाता है. विनर्मता को लोग कमजोरी समझ लिया करते हैं। जैसे अगर कोई विनम्रता और सरलता से अपनी गलतियां या कमजोरियां स्वीकार ले तो हर कोई उसकी कमियाँ निकालने पर आमदा हो जाता है क्योंकि दूसरों की कमियाँ गिनाने में ही उन्हें अपनी  विद्वता  का अहसास होता है शायद, परन्तु वहीँ(...)'

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असमंजस..

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 31-01-2013 11:24:00

'कल रात सपने में वो मिला था  कर रहा था बातें, न जाने कैसी कैसी  कभी कहता यह कर, कभी कहता वो  कभी इधर लुढ़कता,कभी उधर उछलता  फिर बैठ जाता, शायद थक जाता था वो  फिर तुनकता और करने लगता जिरह  आखिर क्यों नहीं सुनती मैं बात उसकी  क्यों लगाती हूँ हरदम ये दिमाग  और कर देती हूँ उसे नजर अंदाज  मारती रहती हूँ उसे पल पल  यूँ ही, ऐसे ही, किसी के लिए भी। मैं तकती रही उसे, यूँ ही  निरीह, किंकर्तव्य(...)'

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पुस्तकालय ऐसे भी..

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 28-01-2013 10:09:00

'यदि विदेशी धरती पर उतरते ही मूलभूत जानकारियों के लिए कोई आपसे कहे कि पुस्तकालय चले जाइए तो आप क्या सोचेंगे? यही न कि पुस्तकालय तो किताबें और पत्र पत्रिकाएं पढ़ने की जगह होती है, वहां भला प्रशासन व सुविधाओं से जुड़ी जानकारियां कैसे मिलेंगी। यह बात शत प्रतिशत सच है। खासकर इंग्लैंड में। यहां आपको बेशक घर ढूंढ़ना हो, बच्चों के स्कूल के बारे में पता करना हो, नौकरी चाहिए हो, मनोरंजन का कोई उपयुक्त स्थान चाहिए हो या फिर पास के क्लीनिक का पता करना हो- सभी का सबसे सुगम जबाब है- लाइब्रेरी। (...)'

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रिश्ते ..

Author : shikha varshney      Blog : स्पंदन SPANDAN      Date : 21-01-2013 13:17:00

'रिश्ते मिलते हों बेशक  स्वत: ही  पर रिश्ते बनते नहीं  बनाने पड़ते हैं। करने पड़ते हैं खड़े  मान और भरोसे का  ईंट, गारा लगा कर निकाल कर स्वार्थ की कील  और पोत कर प्रेम के रंग  रिश्ते कोई सेब नहीं होते  जो टपक पड़ते हैं अचानक  और कोई न्यूटन बना देता है  उससे कोई भौतिकी का नियम। या ग्रहण कर लेते हैं मनु श्रद्धा  और हो जाती है सृष्टि. रिश्ते तो वह कृत(...)'

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चिट्ठाकार

पिछले 24 घंटे में सक्रिय चिट्ठाकार. कोष्ठक में दिखाई गई संख्या पिछले 24 घंटे में प्रकाशित कड़ियों को व्यक्त करती हैं.



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an amalgamation of the diversified traditions
gracefully presented with novelty
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