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आधे - अधूरे : क्या पूर्णता की तलाश वाजिब है?

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 02-05-2013 13:54:00

'बी ए में किसी वर्ष मोहन राकेश का "आधे-अधूरे" नाटक पढ़ा था। लेकिन तब मन में क्या विचार थे, कितना नाटक के मर्म को समझ पायी थी याद नहीं। इस साल फिर पढने का मौका मिला। जीवन में उस मोड़ पर खड़ी  हूँ की इसके मर्म को सिर्फ समझ ही नहीं सकती , समझ कर ज़िन्दगी बदलने वाला निर्णय भी ले सकती हूँ। इसीलिए इस पर विचार करना जरुरी है ... शायद आप भी समझ पाएं, मैं किस दिशा में सोच रही हूँ।1969 में मोहन राकेश ने ये नाटक लिख कर , आने वाले युगों युगों की व्यक्तिक और वैवाहिक जीवन की समस(...)'

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गदल - रांगेय राघव

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 27-04-2013 07:40:00

'गदल कहानी पढ़ी। रांगेय राघव की कहानी। एक ऐसे चरित्र की कहानी जिसका चरित्र चित्रण उतना ही मुश्किल है, जितना खुद का। उसे, जैसी वो है, वैसे देखने पर लगता है मानो, खुद ही को किसी और की नज़रों से देख रहे हों। इसीलिए, उसे जैसी वो है, वैसे देखना मुश्किल है , बेहद मुश्किल। 45 वर्ष की गदल , पति के मर जाने पर अपना पूरा कुनबा छोड़ , 32 साल के मौनी की घर जा बैठती है। मन में है , देवर को नीचा दिखाना है। वही देवर जिसमें इतना गुर्दा नहीं की , भाई के चले जाने के बाद भाभी को अपना(...)'

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खुद को समझने के क्रम में

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 21-04-2013 03:19:00

'खुद को जानने , समझने , पहचानने का भी कैसा मोह है। परम सुख भी। परम आवश्यकता भी। लेकिन समझने के क्रम में जितने भी विचार बुलबुले की भाँती उठते हैं मानो सिर्फ खंड-सत्य है लेकिन खंड सत्य तो हैं ...मुझे लगने लगा है , मैं इस दुनिया की हूँ ही नहीं। और अगर हूँ भी तो वह साधू जो माया और विरक्ति की देहलीज़ पर खड़ा कभी इस ओर  कभी उस ओर सुनी आँखों से ताकता है और जब माया से मुह फेर उसकी बोझिल पलकें विरक्ति के घने वटवृक्ष के नीचे हमेशा के लिए आँखे मूँद लेना चाहती हैं। लेकिन ये खेल वि(...)'

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मेरे देवता !

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 18-04-2013 13:57:00

'मेरे देवता ! दिनभर की खिट -पिट , झगडा जंजाल एक ही ले पर चलती रेलगाड़ी सी ज़िन्दगी बिसरने पर और बिसरता  जा रहा समय घडी की टिक-टिक, एक काम दूसरा काम हज़ारों विचार, लाखों प्रश्न, करोड़ों ख्वाब और ख्वार होती ज़िन्दगी सुनी बालकनी से सड़कों पर चलती जिंदगियों को ताकती आँखे कभी तो खत्म होना है ये , या कभी नहीं ? सपनो में कोई सार नहीं !पर जब तब आँखों में तैर आता है एक द्रश्य - लाल चुनर और सिंदूरी मांग और तभी जाग उठते (...)'

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समर्पण की कसौटी

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 30-03-2013 06:50:00

'एक ही बात रह रह कर मन में आती है , तू उनकी होने वाली है। मनसा होना एक बात है, कर्म से, रीती से बंधन में बंध  जाना दूसरी। क्या उनको पति रूप में पाने के लिए तैयार हूँ? सारे भाव उनको समर्पित करने को तैयार हूँ? क्या ये बड़ी बात है ? नहीं तो , क्या ये इतनी छोटी सी  बात है? क्या यह सच में होना है ? नहीं भी होना , तो मन अभी से इतने भावों से घिरा क्यूँ है? क्यूँ लगता है की , वो यहीं हैं , मेरी इस बचकानी सी बैचैनी पर मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। सच कहूँ तो लगता है ये सम(...)'

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राधा भेली मधाई

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 30-03-2013 03:39:00

'"... अनुखन माधव - माधव रटते रटते राधा माधव हो गयी और माधव के रूप में अपने को स्थापित करते ही बैचैनी कम होने के बजाये और बढ़ गयी , बैचैनी राधा के लिए , जो अब वह नहीं रही और फिर माधव बनी राधा  राधा बनकर माधव को सांत्वना का सन्देश भेजती है , सन्देश पहुंचा नहीं की विह्वल होकर पुनः माधव बन जाती है और एक ही विजड़ित चित्त के दो पात चिर जाते हैं : एक राधा दूसरा माधव , दोनों और आग पकड़ चुकी है, बीच में प्राण एक कीड़े की तरह फंसा हुआ अकुला रहा है .... " ( राधा माधव हो गयी ; विद्यानिवास म(...)'

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गोदान, पुनर्नवा, और स्त्री

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 11-02-2013 07:07:00

'बहुत समय हुआ जब मन में पहली बार ये सवाल उपजा था की- मुझे क्या करना है, जॉब या कुछ नहीं। मैंने कुछ नहीं को चुना - फिर भी बहुत कुछ कर लिया - एम् ऐ हिंदी में, और दादाजी की सेवा, घर के काम भी सिख लिए, और स्वाध्याय का आनंद भी पा लिया। फिर मन में एक सवाल खड़ा हुआ है - अबकी बार शादी का , पति , परिवार, और भविष्य का है। लेकिन जवाब इस बार भी उन्ही विचारों के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है। जॉब नहीं करना - ऐसा तो बिलकुल भी नहीं जिसमे दम घूंटे , जीने के मायने जाते रहे, और इंसान एक पहिया बनकर(...)'

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पुनर्नवा - हजारी प्रसाद द्विवेदी

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 09-02-2013 13:50:00

'बात बस इतनी सी है, मैं खुद को रोक नहीं पा रही। नहीं, इतनी सी बात नहीं हो सकती। मुझे हजारी प्रसाद जी के उपन्यास पढ़ कर न जाने क्या हो जाता है। होता तो निर्मल वर्मा के उपन्यास पढ़कर भी है, लेकिन वो मन को अस्त-व्यस्त कर बुरी तरह से हिल देते हैं, अँधेरे का चरम दिखा देते हैं। लेकिन हजारी प्रसाद जी के लेखन में कोई अलौकिक शक्ति है। ऐसा लगता है जैसे सत्य सौ परदे चीर कर आँखे चौंधिया देता है। वर्मा का लिखा हुआ आत्मानुभाव सत्य-यथार्थ है, हजारी जी का अलौकिक सत्य, जिसका कोई विकल्प नहीं, कोई(...)'

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वे दिन ...

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 19-11-2012 13:03:00

'तुम यकीन कर सकते हो- मैं फिर से निर्मल वर्मा को पढ़ रही हूँ। मुझे लगने लगा है की जो लोग अकेले रहना जानते हैं (सिर्फ शारीरिक तौर पर नहीं, मानसिक तौर पर भी) उन्हें कोई न कोई अच्छा साथी ज़रूर मिल जाता है। अब देखो ये कितना बड़ा संयोग है (या कुछ और ही - अजीब सा ) की मैं इतने दिन यह किताब पढना टालती रही और आज - आज बहुत रो चुकने के बाद मैंने यह किताब उठायी। मुझे अजीब सा विश्वास है- निर्मल वर्मा पर की बहुत दुःख होने पर अगर उन्हें पढ़ा जाए तो इनका साहित्य दावा का काम करेगा। ' एक चिथड़ा सुख' (...)'

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मृत्युंजय - एक चरित्र, अनंत कहानी

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 26-10-2012 13:06:00

'कर्ण ! अब ये मेरे लिए एक नाम या महाभारत का एक चरित्र मात्र  नहीं रह गया है। आज मृत्युंजय  उपन्यास पूरा हुआ। किसी भी कार्य के शुरू होने से उसके पुरे होने की भी एक कहानी होती है। लेकिन आज वह नहीं। यूँ तो विचारों के कई बुलबुले जैसे  कई दिशाओं में फेल गए हैं , लेकिन मैं मात्र एक को लेकर चलूंगी। अब , आखिर, अब भटकना उचित नहीं। पांच पांडव या कर्ण  - इनमे से कौन श्रेष्ठ है? ये सवाल नहीं, ये विचारों का जाल है। श्रेष्ठता को सिद्ध करना इतन(...)'

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अध्-पके विचार - मृत्युंजय (शिवाजी सावंत)

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 15-10-2012 12:43:00

'मेरा मन अभी कितने भावों का क्रीडा-स्थल बना हुआ है, मैं बता नहीं सकती। एक लम्बी यात्रा से जब घर पहुंची तो इस बात का अंदाजा भी नहीं था की मम्मी  ने मेरे लिए 'मृत्युंजय' लाकर रखी होगी . न जाने कबसे इस पुस्तक को पढने की हार्दिक इच्छा मन में थी।दो-तीन दिन ही हुए हैं किताब शुरू किये हुए, लेकिन मन में न जाने कितने विचार आ गए।  विचारों की तो छोडिये, न जाने कितने भाव जो किरदारों ने महसूस किये वो मेरे मनचले मन ने भी कर डाले।मृत्युंजय , महशूर मराठी उपन्यासकार(...)'

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अमृता प्रीतम : एक मर्द , एक औरत

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 31-08-2012 12:39:00

'"तुमने पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे पढ़ी है?" मर्द ने पुछा? " पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे  "? "ओस्कर वाइल्ड का मशहूर उपन्यास. ""मेरा ख्याल है, कोलेज के दिनों में पढ़ी थी, पर इस वक्त याद नहीं...शायद उसमे पेंटिंग की कोई बात थी..""हाँ... पेंटिंग की. वह एक बड़े हसीं आदमी की पेंटिंग थी...""फिर शायद वह आदमी हसीं नहीं रहा था और उसके सात ही उसकी पेंटिंग बदल गयी थी .. कुछ ऐसी ही बात थी... ""नहीं, वह उसकी दिखती शक्ल के साथ नहीं  बदली थी, उसके मन की हालत से बद(...)'

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अमृता प्रीतम : "सात सौ बीस कदम".

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 31-08-2012 12:22:00

'न जाने क्या मन हुआ, निर्मल वर्मा की ' वे दिन' के साथ  अमृता प्रीतम की एक कहानियों की किताब उठा ली - नाम है - "सात सौ बीस कदम". अमृता प्रीतम की आत्म-कथा पढ़ी थी - रसीदी टिकिट' तभी से मन में था की इन्हें और पढना है...अभी सिर्फ दो कहानियाँ पढ़ी होंगी, लेकिन मन में कई विचार आ रहे हैं.  मन में एक तरह का द्वंद्व हमेशा चलता रहता है. एक तरफ मन कहता है, जैसे सब लिख रहें हैं, वैसे तुम भी लिखो , लेकिन फिर, वर्मा और प्रीतम जैसे लेखकों को पढ़कर मन पर लगाम लग जाती है. मन (...)'

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निर्मल वर्मा - और आत्मालाप

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 13-08-2012 13:01:00

'मैंने सोचा नहीं था इतना जल्दी निर्मल वर्मा को पढ़ पाऊँगी, पर हार्डी के बाद उन्हें पढना अच्छा लग रहा है , ऐसा जैसे, 'दुःख' के एक चेप्टर से दूसरे चेप्टर पर आ गयी हूँ... बिलकुल अंदेशा न था, पर ऐसा ही हुआ, इस उपन्यास ने मुझे (मेरे अंदर बहुत कुछ जिसे मैंने एकत्रित कर लिया था उसे) decenter कर दिया है. जैसे चार पाए पर खड़े दो लड़खडाते पैरों के निचे से पाए खीच लिए हो...पूरी रात सो नहीं पायी (उपर से तेज़ थर्राती बारिश की आवाज़..).. पता नहीं रात में मैंने कितनी बार तड़पते हुए, गुस्से में(...)'

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'एक चीथड़ा सुख'

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 12-08-2012 10:48:00

'"...उसके ड्राइंग मास्टर क्लास में कहते थे - देखो, ये सेब है. यह सेब टेबल पर रखा है. इसे ध्यान से देखो. सीढ़ी आँखों से - एक सुन्न निगाह सुई की नोक-सी सेब पर बिंध जाती. वह धीरे धीरे हवा में घुलने लगता गायब हो जाता. फिर, फिर अचानक पता चलता - सेब वहीँ है, मेज पर जैसा का तैसा - सिर्फ वह अलग हो गया है, कमरे से, दूसरे लड़कों से, मेज ओर कुर्सियों से - और पहली बार सेब को नयी निगाहों से देखा रहा है. नंगा, साबुत, संपूर्ण, ... इतना संपूर्ण की वह भयभीत सा हो जाता है, भयभीत ही नहीं- सिर्फ एक अजीब(...)'

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Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 11-05-2012 07:53:00

'झूठ और सच के परेएक आदम कद चेहरा हैजिसके गहन गंभीर भावों में लिखा है - "अहम् ब्रह्मास्मि" !!!'

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प्रार्थना

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 14-04-2012 15:49:00

'खोना व्यर्थ न हो मेरा ;मेरा खोना भी होपाने जैसा ही...'

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Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 02-04-2012 05:19:00

'मैं हूँ भीऔर नहीं भीक्या होने से मेरेमुझे खुद भी फर्क पड़ता है'

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इंतज़ार

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 22-02-2012 05:11:00

' आइ एम रिअली वेरी सोरी , मैं उस दिन घर नहीं आ सका.नहीं... कोई बात नहीं... मुझे इंतज़ार करना पसंद हैओह.. सच तुम मेरा इंतज़ार कर रही थी ?हाँ... शायद... या इस बात का कि तुम आओ ही न और ज़िन्दगी बस यूँही एक इंतज़ार में कट जाये...*-------------------------------*----------------------------------*"ज़िन्दगी क्या है?""एक लम्बा इंतज़ार ! प्यार... और फिर बिछड़ जाने का डर ..."*----------------------------------*--------------------------------*कभी खुद को रोक नहीं पाती (...)'

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सच्चा सुख और सृजन

Author : @ngel ~      Blog : { आत्मिक ओज }      Date : 15-02-2012 11:15:00

'जीवन के एक सूत्र को भी किसी माध्यम से जाहिर कर देने में कितना सुख है.सच्चा सुख और सृजन दो अलग बातें हो ही नहीं सकती.चाहे किसी कला के माध्यम से सृजन होया प्रेम में अभूतपूर्व क्षणों का सृजन होहमेशा सृजन में सच्चा सुख छिपा होता है.'

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चिट्ठाकार

पिछले 24 घंटे में सक्रिय चिट्ठाकार. कोष्ठक में दिखाई गई संख्या पिछले 24 घंटे में प्रकाशित कड़ियों को व्यक्त करती हैं.



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gracefully presented with novelty
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